Tuesday, 26 April 2016

फिर दुनिया ये तेरी मुश्किल में है। 

मैं तुझमें हूँ, तू मुझमें है ,
फिर क्यों खोजूँ, दर दर भटकूँ
जब तू शामिल, कण कण में है
भूखा बन तू रोया,कभी सड़कों पे सोया
घायल पंछी के स्वर में कभी
अबला की करूँण पुकार में है
टूटा जो कोई,तू टूट गया
उसके दुःख में,तू डूब गया
तू गलियों और चौबारों में
तू ही  राम में और रहीम में है
क्यों बहे खून,फिर लोगों का
क्यों छिड़ते नाहक युद्ध यहाँ
क्यों धर्म का पाठ पढाते हैं
जब तू ही बसा हर मजहब में है
तू पाठ पढ़ा,मानवता का
छोड़ें झूठा आडम्बर हम
ये धर्म जाति के ढोल बजा
मारा हमने उस रब को है
जग के स्वामी सुन ले ये पुकार
कुछ तू ही अपना जलवा दिखा
भाई न लडे फिर भाई से
न छुआछूत का बैर पले
गर ये न रुका अब और यहाँ
फिर दुनिया ये तेरी मुश्किल में है।
फिर दुनिया ये तेरी मुश्किल में है।



--------ऋतु  अस्थाना




Monday, 18 April 2016

उसी बचपन में जाना है।


उसी बचपन में जाना है। 


ना जाने क्यों हर दर्द में ,
जुबां पर नाम उन का ही आता है। 
उन्हीं के हाथ का खाना ,
आज भी मुझको भाता है। 
कमाई बहुत हुई यारों ,
अब तो घर याद आता है। 
वो माँ की बाहों का झूला ,
मुझे हर पल बुलाता है। 
दे अगर इक और मौका, ऐ जिंदगी ,
बन के मासूम एक बार फिर। 
उस गोदी में सोना चाहता हूँ,
यूँ सिमट जाऊँ माँ के पल्लू में। 
कि फिर जहाँ में कोई ढूंढ न सके। 
भूल कर हर परेशानी और गम को ,
कि  कोई तकलीफ भी मुझे छू न सके। 
आज इक बार फिर बचपन ,
इस तरह क्यों रिझाता है। 
दूर से देख कर आज बचपन ,
भी मुझ पर मुस्कुराता है। 
एक बार फिर भरी बारिश में ,
कागज़ की कश्ती को चलाना  है। 
मुझे फिर लौट के वापिस ,
उसी बचपन में जाना है। 
मुझे फिर लौट के वापिस ,
उसी बचपन में जाना है। 

## ऋतु अस्थाना  ##

Sunday, 17 April 2016

नहीं फिर दूर तुझसे, तेरा रब है।




इश्क मजहब,

इश्क  इबादत,

इश्क बरकत,

इश्क मोहब्बत,

इश्क जरुरत,

इश्क मौला,

इश्क रब है,

गर इश्क हो हर बन्दे से उसके,

नहीं फिर दूर तुझसे, तेरा रब है।

--------ऋतु अस्थाना 
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Saturday, 16 April 2016

गुल ए गुलज़ार फिर अपना चमन हो। 



काश ऐसा हमारा वतन हो ,
न भूखा हो कोई , 
न कोई दुखी हो ,
सभी के उजले से और ,
भोले से मन हों।   
एक ही धर्म हो ,
बस इंसानियत का, 
न हो मंदिर, न मस्जिद  ,
का कोई भेद ही हो।  
हर बन्दे के दिल में ,
दरिया बस प्यार का हो।  
बैर न हो ऊंच-नीच का ,
ऐसा ही बेजोड़ हमारा भी घर हो। 
एक ही धर्म की खुशबू,
चलो चल कर बिखेरें,
होंगे कुछ नए से ,
फकत अपने सवेरे। 
 ख्वाब ये चल फिर से हम देखें , 
कि अलबेला सा इक अपना चमन हो।
जब मिसाल दे दुनिया  ,
कि देखो तो ये  भारत ,
कितना बदल गया है ,
लहू देखो लहू में ये ,
किस तरह घुल सा गया है। 
 दर्द जब किसी गैर का ,
भी अपना सा लगेगा ,
उस रोज़ वतन अपना  ,
यक़ीनन बदलने लगेगा। 
हर धर्म से उपर 
भी एक धर्म होता है। 
क़र्ज़ माटी का चुकाना 
भी अपना फ़र्ज़ होता है। 
कीजिये इश्क यूँ कि कबीले तारीफ़ हो  ,
वतन परस्तों की फेहरिस्त में ,
नाम अपना भी दर्ज हो।
ऐ खुदा ख्वाब अपना ये पूरा हो ,
गुल ए गुलज़ार फिर अपना चमन हो। 
गुल ए गुलज़ार फिर अपना चमन हो।

------ऋतु अस्थाना 

Tuesday, 12 April 2016



वो मजदूर का बेटा।

कल जिंदगी को कुछ, 

यूँ देखा करीब से।

 रिश्ता न कोई था,

मेरा उस गरीब से। 

वो मजदूर का बेटा,

गली में खेल रहा था।

 कड़ी धूप से बेखबर,

जिंदगी को झेल रहा था। 

वो नन्हा जो मुस्कुराया,

तो मुस्कुरा मैं भी उठी। 

बिना किसी सौगात के,

नन्ही सी आँखें चमक उठीं।

 उस पल को जिंदगी ज्यों, 

फिर गुनगुना उठी।

 न कोई रिश्ता और,

न कोई  सम्बन्ध ही था।

 फिर भी वो पल  न जाने क्यों,

मुझे गुदगुदा रहा था।

 कुछ नाज़ सा हुआ खुद पर,

कि काम कुछ अच्छा कर गए।

 जो रिश्ता इंसानियत का,

हम अता कर गए। 

जो रिश्ता इंसानियत का,

हम अता कर गए। 

##  ऋतु अस्थाना  ##







Sunday, 10 April 2016


तो फिर बदनाम हम सरेआम होते हैं !!!!!



क्यों जिंदगी को हम,

  गलत इलज़ाम देते हैं। 

कई बार जिंदगी से गम,

 हम खुद उधार लेते हैं। 

 लगा कर दिल किसी पत्थर से ,

तड़प दिन रात रोते हैं। 

 ख्वाबों में फिर यादें  सजा के,

 मुफ्त में क्यों अधिकार लेते हैं। 

 न है वो तेरा, ये जानकर भी ,

   दिल पे तीर ए नश्तर चुभोते हैं ,

 फिर दर्द को अपना बनाकर। 

 हम आशिकी में यूँ बर्बाद होते हैं। 

कलम जब हाथ में आती है,

 तो फिर बदनाम हम सरेआम होते हैं। 



### ऋतु अस्थाना ##